visit

स्वास्थ्य-सबके लिए

शनिवार, 6 नवम्बर 2010

निद्रा और दीर्घायु का सम्बन्ध

प्रायः वृद्ध लोग शिकायत करते रहते हैं कि उन्हें ठीक से नींद नहीं आती अथवा बहुत अल्प काल के लिए ही नींद आती है. उनकी चिंता स्वाभाविक है क्योंकि नींद की अवधि और दीर्घायु का विशेष सम्बन्ध है. इस घनिष्ठ सम्बन्ध का कारण यह है कि व्यक्ति के निद्रालीन होते समय ही जब शरीर और मस्तिश पर और कार्यभार नहीं होते, तभी उसके शरीर की नष्ट-भृष्ट कोशिकाओं की देखरेख, अनुरक्षण और पुनर्निर्माण कार्य होते हैं जो दीर्घायु के लिए परम आवश्यक हैं.

निद्रा पूर्व की स्थिति
किसी भी व्यक्ति का बिस्तर पर पड़े रहना निद्रा नहीं होती किन्तु निद्रा के लिए उसका शांत पड़े रहना अनिवार्य होता है. इसलिए निद्रा के लिए व्यक्ति का बिस्तर पर विश्राम के साथ लेट जाना होता है. इसके बाद उसका मस्तिष्क शरीर का अध्ययन करता       है और निद्रा के प्रतिकूल स्थितियों को अनुकूल करता है और निद्रा की व्यवस्था करता है. शरीर के स्वस्थ होने की स्थिति में और शरीर को निद्रा की आवश्यकता होने पर इस प्रक्रिया में १५ से ३० मिनट का समय लग जाता है.

व्यक्ति के अत्यधिक थके होने पर अथवा उस द्वारा आवश्यकता से अधिक भोजन किये जाने की स्थितियां निद्रा के प्रतिकूल होती हैं. इन्हें अनुकूल करने के लिए व्यक्ति को मूर्छा आ सकती है जिसे प्रायः निद्रा समझ लिया जाता है किन्तु यह निद्रा कदापि नहीं होती. इस मूर्छा की अवधि स्थिति की प्रतिकूलता पर निर्भर करती है इसलिए इसका कोई पूर्वाकलन नहीं किया जा सकता.

शरीर में कोई व्याधि होने पर भी उसकी व्याकुलता की स्थिति निद्रा के अनुकूल नहीं होती. ऐसी स्थिति में मस्तिष्क व्याकुलता को शांत करता है जिसमें प्रतिकूलता के अनुसार समय लगता है. यह समय भी निद्राकाल नहीं होता.
 
निद्रा क्या है
व्यक्ति का जागृत न होना ही निद्रा का संकेत नहीं है, मूर्छा के कारण भी व्यक्ति जागृत नहीं होता जो स्थिति रुग्णता, व्याकुलता, मानसिक चिंता, अत्यधिक थकान और अत्यधिक भोजन के कारणों से उत्पन्न हो सकती है. इन स्थितियों में व्यक्ति के सभी शारीरिक तंत्र शांत न होकर दोषी प्रणाली को सामान्य स्थिति में लाने के लिए कार्य करते हैं. व्यक्ति को गहरी नींद तभी आती है जब उसके शरीर के अंग-प्रत्यंगों कोई व्याकुलता न हो.

नींद की स्थिति की सही जांच उसकी नाडी से का जाती है जब उसमें अनियमित उत्तेजनाएं न होकर उसमें गति नियमित और सहज हो. ऐसी स्थिति में ही शरीर में पुनर्निर्माण कार्य संपन्न होते हैं जो व्यक्ति के जीवन काल को निर्धारित करते हैं. अतः दीर्घायु के लिए पूर्ण निद्रा आवश्यक है जो बिस्तर पर पड़े रहना, व्याकुल स्थिति में करवटें बदलते रहना, अथवा थकान और अपाचन से मूर्छित होना नहीं है. इन स्थितियों में शरीर को विश्रांति प्राप्त नहीं होती.

निद्रा पश्चात की स्थिति
पूर्ण निद्रा की स्थिति में शरीर और मस्तिष्क दोनों शांत अवस्था में रहते हैं. इस काल में शरीर के अनुरक्षण का कार्य होता है और यह काल व्यक्ति के शरीर और मस्तिष्क की आवश्यकता पर निर्भर करता है. प्रायः शरीर को निद्रा की मस्तिष्क से अधिक आवश्यकता होती है किन्तु इसका विपरीत भी संभव होता है. जब शरीर निद्रावस्था में हो और मस्तिश की आवश्यकता पूरी हो गयी हो तो व्यक्ति स्वप्न देखने की स्थिति में आ जाता है. इस प्रकार स्वप्न काल भी निद्रा काल नहीं होता. इसके विपरीत जब शरीर की निद्रा पूर्ण हो जाए और मस्तिष्क सुषुप्त रहे तो स्थिति विचित्र हो जाती है. शरीर सक्रिय होना कहता है किन्तु मस्तिश के सहयोग के बिना यह संभव नहीं हो पाता. इस अवस्था में शरीर में व्याकुलता होने लगती है किन्तु व्यक्ति को इसका ज्ञान नहीं हो पाता.

इस प्रकार स्वप्नावस्था भी पूर्ण निद्रा नहीं होती क्योंकि इस स्थिति में व्यक्ति का शरीर ही विश्राम पाता है जबकि उसका मस्तिष्क जागृत रहता है जो शरीर की किसी स्थिति अथवा व्यक्ति की पारिस्थितिकी के विरुद्ध अपनी प्रतिक्रियाओं में व्यस्त रहता है और स्वप्नों के माध्यम से उन्हें व्यक्त करता है. पूर्ण निद्रा की स्थिति में मस्तिष्क भी शांत होना चाहिए तभी तो यह शरीर में पुनर्निर्माण कार्य कर सकेगा.

स्वस्थ दीर्घायु के लिए
अस्वस्थ रहते हुए दीर्घायु का ऋणात्मक महत्व होता है - व्यक्ति और समाज दोनों के लिए. इसलिए दीर्घायु की कामना तभी की जानी चाहिए जब व्यक्ति पूर्णतः स्वस्थ हो. वस्तुतः अस्वस्थ व्यक्ति का दीर्घायु होना उतना ही हानिकर होता है जितना कि इसी स्वस्थ व्यक्ति का अल्पायु होना.
Deep Sleep: Complete Rest for Health, Vitality and Longevity

दीर्घायु का सीधा सम्बन्ध वृद्धावस्था में निद्रा की अवधि से है इसलिए इस चर्चा में वृद्धावस्था पर ही विचार होगा. ५० से ८० वर्ष की महिलाओं के अध्ययन से पाया गया है कि ५ से ६.५ घंटे की पूर्ण निद्रा लेने वाली महिलाएं सर्वाधिक काल तक जीवित रहती हैं. पुरुषों की शारीरिक गतिविधि अधिक होने से यह अवधि कुछ अधिक हो सकती है. इस निद्रा काल में निद्रा-पूर्व और निद्रा-पश्चात के काल सम्मिलित नहीं हैं. इस प्रकार दीर्घायु के लिए ५० वर्ष के अधिक आयु के व्यक्ति को  प्रतिदिन ६ से ८ घंटे के पूर्ण विश्रांत अवस्था में रहने की आवश्यकता होती है, जो दो भागों में करना अधिक लाभप्रद रहता है - रात्री में लगभग ६-७ घंटे तथा दोपहर के भोजन के बाद लगभग १ से २ घंटे.

1 comments: