चिंताएं, जीवन-शैली में अचानक परिवर्तन, रात्रि काल में जागरण, और अपर्याप्त शारीरिक गतिविधि अनिद्रा के प्रमुख कारण होते हैं. इसकी दीर्घ अवधि तक बने रहने से व्यक्ति के सामान्य स्वास्थ के दुष्प्रभावित होने के अतिरिक्त उसे मानसिक तनाव अथवा अवसाद, केंसर, वातरोग, मधुमेह आदि व्याधियां भी आरम्भ हो सकती हैं. व्यक्ति की सबसे प्रबल चिंता उसे निद्रा का अभाव ही बन जाती है जिससे यह व्याधि दीर्घ काल तक बनी रह सकती है. इसलिए स्वास्थ की रक्षा के लिए निद्रा के अभाव का शीघ्र निवारण किया जाना चाहिए. निद्रा का अभाव स्त्रियों में पुरुषों से अधिक, तथा वृद्धों में युवाओं से अधिक पाया जाता है. इससे सिद्ध होता है कि शारीरिक गतिविधि का अपर्याप्त होना निद्रा अभाव का विशेष कारण होता है.
शोधकर्ताओं ने कुछ औषधियों को पाया है जो व्यक्ति में निद्रा उत्प्रेरित करती हैं जिन्हें दो वर्गों में रखा जाता है. प्रथम वर्ग की औषधियों का प्रभाव अल्पकालिक होता है जो रात्री में निद्रा के बाद प्रातः समाप्त हो जाता है. यद्यपि इनका सेवन निरापद होता है किन्तु इनकी आदत से बचने के लिए इन्हें तभी लिया जाना चाहिए जब निद्रा प्राकृत रूप से न आये और उसकी आवश्यकता हो. इनसे मस्तिष्क शांत होता है और शरीर के व्याकुल अंगों को राहत मिलती है जिससे व्यक्ति को निद्रा आने लगती है. इनके लेने से शरीर का प्रकृति के साथ संकालन हो जाता है और व्यक्ति को वांछित समय पर स्वतः ही निद्रा आने लगती है.
दूसरे वर्ग की औषधियां व्यक्ति पर वशीकरण जैसा प्रभाव उत्पन्न करती हैं जो दीर्घ अवधि तक बना रहता है और व्यक्ति का सामान्य जीवन दुष्प्रभावित होता है. इनका उपयोग व्यक्ति पर गंभीर सदमे के आघात आदि के उपचार के लिए किया जाता है जिससे व्यक्ति अपनी पारिस्थितिकी से मुक्त अनुभव करने लगता है. निस्संदेह, ये औषधियां निरापद नहीं होतीं इसलिए इनका उपयोग विशेष परिस्थितियों में भी चिकित्सक के परामर्शानुसार ही किया जाना चाहिए.
पैरासोम्निया कहे जाने वाले अनिद्रा रोगों में व्यक्ति रात्रि में सोते हुए आतंकित अनुभव करता है, चलाने लगता है, तथा/अथवा हिंसक व्यवहार करने लगता है. इसके उपचार के लिए व्यक्ति का पोलीसोम्नोग्रफी तकनीक से परीक्षण किया जाना आवश्यक होता है जिससे ज्ञात होता है कि व्यक्ति की ये गतिविधियाँ तीव्र नेत्र गति (REM) के साथ होती हैं अथवा इसके बिना. इन दो स्थितियों के उपचार भी भिन्न होते हैं जो निद्रा विशेषज्ञों द्वारा ही किये जाने चाहिए.
तीसरे प्रकार की अनिद्रा व्याधि में व्यक्ति के शरीर का प्राकृत काल-चक्र - यथा दिन-रात - से सम्बन्ध टूट जाता है जो प्रायः रात्रि में कार्य करने से अथवा वायुयान द्वारा भिन्न काल क्षेत्रों की यात्रा करने से होता है. यह असामान्यता शरीर द्वारा कुछ समय व्यतीत होने पर स्वतः ही ठीक कर ली जाती है, इसलिए इसके लिए किसी औषधि की आवश्यकता न होकर केवल धैर्य की आवश्यकता होती है.
अनिद्रा से मुक्ति के लिए मनोवैज्ञानिक उपचार औषधीय उपचारों से अधिक उपयोगी और निरापद पाए गए हैं जिन्हें संज्ञान-परक व्यवहार उपचार (Cognitive Behavioral Therapy - CBT) कहा जाता है. इनमें व्यक्ति को उत्साहित करते हुए उसका ध्यान विपरीत परिस्थितियों से विमुख किया जाता है अथवा जीवन में खुशियाँ पाने के उपायों का अनुसरण कराया जाता है.
अनिद्रा के निवारण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि निद्रा सम्पूर्ण शरीर की प्रक्रिया है इसलिए इसके उपचार में सम्पूर्ण शरीर को ही उपचारित किया जाना चाहिए. शरीर में कुछ तंतु पूरे शरीर में फैले रहने के साथ-साथ व्यक्ति की हथेलियों और उसके तलवों पर समाप्त होते हैं, इसलिए हथेलियों और तलुओं के माध्यम से सम्पूर्ण शरीर का प्राकृत उपचार किया जाना संभव होता है जिससे अनिद्रा का निवारण हो जाता है. पैदल चलना एक ऐसा व्यायाम है जो व्यक्ति के तलवों के माध्यम से सम्पूर्ण शरीर को उपचारित करता है और यह अनिद्रा निवारण में उपयोगी सिद्ध होता है. शरीर पर और विशेषकर हथेली और तलुओं पर तेल मालिश भी शरीर को तनाव मुक्त करने में उपयोगी होकर व्यक्ति में निद्रा का उत्प्रेरण करती है.
वृद्धावस्था में शारीरिक गतिविधियों के कम हो जाने से उनके भोजन की मात्रा तथा निद्रा की आवश्यकता कम हो जाती हैं, इसलिए उन्हें निद्रा अभाव को एक व्याधि न मानते हुए अल्प निद्रा में भी सामान्य जीवन जीना चाहिए. अनेक वृद्धों को यह अनावश्यक चिंता बनी रहती है कि उन्हें पूरी नींद नहीं आती जब कि वे स्वस्थ होते हैं और उन्हें अधिक निद्रा की आवश्यकता ही नहीं होती. उनकी अनावश्यक चिंता ही उनमें अनिद्रा की व्याधि बंब जाती है. इतना अवश्य है कि उन्हें दिन के समय में भी लगभग ६ घंटे जागृति के बाद कुछ विश्राम कर लेना चाहिए.


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