वस्तुतः मनोवैज्ञानिक उत्पीडन का विरोध न करना व्यक्ति की मानसिक मृत्यु है, जो उसकी शारीरिक मृत्यु से अधिक घातक है क्योंकि मन व्यक्ति के शरीर से अधिक महत्व रखता है. अनेक आधुनिक और प्राचीन समाज इस मृत्यु को भी उतना ही महत्व देते हैं जितना कि शारीरिक मृत्यु को. तिरस्कार परिवार के किसी सदस्य द्वारा किया गया हो अथवा किसी मित्र द्वारा, प्रेयसी द्वारा किया गया हो अथवा समाज द्वारा, तिरस्कृत व्यक्ति को इसकी पीड़ा एक जैसी ही होती है. परीक्षणों से पाया गया है कि जो औषधियां शारीरिक पीड़ा शामक होती हैं, वे उक्त मानसिक पीड़ा के शमन में भी समर्थ होती हैं.
मनुष्य के मस्तक के लगभग एक इंच पीछे मस्तिष्क का जो भाग होता है, वह व्यक्ति को अकेले दण्डित किये जाने की अवस्था में सक्रिय हो जाता है और प्रश्न उठाता है कि 'यह दंड उसे ही क्यों दिया गया है'. इस भाग को 'अग्र पेटी परत' (anterior cingulate cortex) कहा जाता है. यही भाग व्यक्ति की प्रत्येक पीड़ा के भावुक पक्ष को प्रकट करता है. संभवतः आदिकालीन जीव में केवल शारीरिक पीड़ा अनुभव करने की सामर्थ्य थी किन्तु उसके मानव-पर्यंत उद्भवन में मस्तिष्क में सामाजिक क्रिया-प्रतिक्रियाओं और इनसे होने वाली मानसिक पीड़ा अनुभव किये जाने का अतिरिक्त प्रावधान हुआ है.
शोधों से पाया गया है कि अफीम-युक्त औषधियां जहां शारीरिक पीड़ा का निवारण करती है, वहीं मानसिक तनाव का भी शमन करती हैं. एसीतामिनोफेन ऐसी ही एक दर्द निवारक औषधि है जो शारीरिक वेदना के अतिरिक मानसिक पीड़ा के शमन में भी उपयोगी पायी गयी है. इससे सिद्ध हुआ है कि मनुष्य के मस्तिष्क में शारीरिक हानि की संभावना के संकेत देने वाली प्रणाली ही तिरस्कार की प्रतिक्रिया के माध्यम के रूप में उद्भवित हुई है.
एसीतामिनोफेन औषधि के सेवन के बाद व्यक्ति के नैतिक व्यवहार में भी परिवर्तन पाया गया है. ऐसा व्यक्ति सामाजिक हित के पक्ष में अधिक निर्णायक सिद्ध होता है और सामाजिक रूप से हास्यास्पद स्थितियों को भी साहस के साथ निरस्त करता है. सब मिलाकर यह औषधि, जिसे 'टायलेनोल' भी कहा जाता है, व्यक्ति को दुखद स्थिति में भी सुखद अनुभूति प्राप्त करने में सहायक होती है.


मैं ऐसे एकाध लोगों को जानता हूं जो जड़ माईग्रेन में अफीमयुक्त औषधियों से फायदा हुआ। मगर बाद में यही लत बन जाती है जो स्वयं एक रोग साबित होती है।
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