समाजीकरण के मनोवैज्ञानिक शोधों में पाया गया है कि स्वास्थ चेतना में जटिल संबंधों का विशेष महत्व होता है, जिनमें सभी द्वारा एक दूसरे से परम्परा के रूप में सीखते हैं. इस सीखने की प्रक्रिया में ही मनुष्य की आदतें विकसित होती है जो अच्छे अथवा बुरी हो सकती हैं जो किसी बात को बार-बार सुने अथवा देखे जाने से प्रभावित होती हैं. घनिष्ठ संबंधों में ऐसी पुनरावृत्ति बहुधा होती रहती हैं.
एक मूल सिद्धांत है - किसी भी नए विचार को अपनाने में लोगों को उसे बार-बार सुनना उत्प्रेरक सिद्ध होता है. नाजी नेता हिटलर ने भी कहा था कि लोगों के समक्ष कोई बात बार-बार दोहराने से उन्हें बड़े से बड़ा झूठ भी सत्य प्रतीत होने लगता है. इसके साथ ही दूसरा सामाजिक सत्य यह है कि प्राकृत रूप में लोग अस्वस्थ नहीं होते, उन का स्वास्थ प्रायः उनकी आदतों में विकृतियों के कारण खराब होता है जिसके निवारण के लिए में इसके प्रति जागृत होना आवश्यक होता है. इस जाग्रति हेतु ही मानव ने अपना समाजीकरण किया ताकि हम सभी एक दूसरे के अनुभवों से सतत सीखते रहें, प्रत्येक ज्ञान के लिए स्वयं अनुभवों की आवश्यकता न्यूनतम रहे.
जटिल सम्बद्धता में किसी विकसित धारणा को बार-बार संबल प्राप्त होता है, जिसे सामाजिक संबलन कहा जाता है, तथा जिस के कारण वह शीघ्रता से एक आदत के रूप में परिपक्व हो जाती है जब कि विरल सम्बद्धता में किसी किसी धारणा का आदत के रूप में विकसित होने में समय लगता है. पारस्परिक प्रभाव से व्यक्तियों के व्यवहार में वृहद् स्तर पर परिवर्तन बड़ी शीघ्रता से होते हैं. इन परिवर्तनों का मुख्य कारण व्यक्ति में पारस्परिक आस्था और विश्वास का विकसित होना होता है.
उपरोक्त के विपरीत, व्यक्ति के बौद्धिक विकास में विरल संबंद्धता का अधिक महत्व होता है क्योंकि इस प्रकार की सम्बद्धता में सामाजिक संबलन तो नहीं होता किन्तु व्यक्ति को चिंतन करने हेतु पर्याप्त समय मिलता है जिससे उसका बौद्धिक विकास तीव्रता से होता है. इस प्रक्रिया में पारस्परिक आस्था और विश्वास का योगदान ऋणात्मक होता है जब कि चिंतन धनात्मक योगदान देता है. इस प्रकार जटिल सम्बद्धता व्यक्ति के बौद्धिक विकास में बाधक सिद्ध होती है.
उपरोक्त चर्चा से सिद्ध होता है कि भारतीय समाज में पारस्परिक आस्था और विश्वास की बहुलता है जिसके कारण बौद्धिकता की क्षति होती है किन्तु अच्छे या बुरी आदतें शीघ्रता से परिपक्व होती हैं जिनमें परिवर्तन दुष्कर होता है. इसका एक दुष्परिणाम ईश्वर और धर्म के प्रति आस्था है जिस पर प्रायः चिंतन नहीं किया जाता और दुष्कर्मी इस आस्था का दुरूपयोग करते रहे हैं.
स्वास्थ सामाजिक परम्पराओं और व्यक्तिगत आदतों से अधिक प्रभावित होता है. इसलिए इस के प्रति जागृति में जटिल संबंधों का योगदान भी अधिक महत्वपूर्ण होता है जिसका माध्यम पारस्परिक आस्था और विश्वास होता है.. तथापि, यदि समाज का अग्रणी वर्ग पारस्परिक आस्था और विश्वास का दुरूपयोग कर लोगों में भ्रमित धारणाएं बीजारोपित करे तो उनकी परम्पराएं तथा आदतें भी कुत्सित हो जाती हैं जिनका दुष्प्रभाव उनके स्वास्थ पर भी पड़ता है. अच्छी और बुरी परम्पराओं तथा आदतों का सर्वोत्तम मानदंड परिणाम होते हैं. यदि किसी समाज के अधिकाँश सदस्य रुग्ण हों तो समझ लेना चाहिए कि उसकी परम्पराएं और व्यक्तियों की आदतें कुत्सित है और उनमें सुधार की नितांत आवश्यकता है. यह सुधार केवल बौद्धिकता के माध्यम से हो सकता है जबकि समाज की जटिल सम्बद्धता बौद्धिकता विकास में बाधक होती है.
इस परिपेक्ष्य में भारतीय समाज की परम्पराओं को कुत्सित और व्यक्तियों की आदतों को दूषित कहा जाएगा क्योंकि यहाँ अधिकाँश व्यक्ति रुग्ण हैं. साथ ही यहाँ के समाज में संबंधों की जटिलता बौद्धिकता के विकास में बाधक है जिसके कारण कुत्सित परम्पराओं और दूषित आदतों में परिवर्तन दुष्कर हो रहा है.


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