"जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं."जी हाँ 'जिन्दादिली' अर्थात 'सजग ह्रदय' जिसे वर्तमान प्रकरण में 'तन और मन की सजगता' कहना अधिक उचित होगा, ही स्वस्थ जीवन का लक्षण है. जिनमें यह सजगता नहीं होती, वे केवल चिकित्सीय दृष्टि से जीवित होते हैं, सांसारिक दृष्टि से वे मृत ही कहे जाने चाहिए.
सजगता जिज्ञासा से उत्पादित होती है. इस प्रकार जिज्ञासा ही व्यक्ति के जीवंत होने का लक्षण होती है. एक ओर यह स्वस्थ जीवन का लक्षण है तो दूसरी ओर यही स्वस्थ जीवन की उत्प्रेरक होती है. अतः जिज्ञासु ही जीवंत होता है और जीवंत व्यक्ति ही जिज्ञासु होता है. इस प्रकार जीवंत होना और जिज्ञासु होना एक दूसरे को चाक्रिक रूप में सशक्त करते हैं, और यही चक्रव्यूह मनुष्य के तन और मन को स्वस्थ और सौन्दर्य-पूर्ण बनाता है.
मनुष्य को सजग होने के लिए किसी नए स्थान पर जाने अथवा किसी नए व्यक्ति अथवा नयी वस्तु से परिचित होने की आवश्यकता नहीं होती, किन्तु जो कुछ आसपास है उसी के बारे में और अधिक जानने की जिज्ञासा की आवश्यकता होती है. यह भी सुनिश्चित है, प्रत्येक व्यक्ति अथवा वस्तु में सदैव बहुत कुछ वह होता है जिसका हमें ज्ञान नहीं होता और जिसे जानना हमारे लिए परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप में लाभकर होता है.
जिज्ञासा एक प्रवृत्ति है जो मनुष्य जाति को आदिम अवस्था से आधुनिकता तक लाई है, जिसके कारण इसे विकास की उत्प्रेरक कहा जा सकता है. यह प्रवृत्ति प्रत्येक मनुष्य में जन्मजात होती है जिसे अंतर्चेतना (इंस्टिंक्ट) कहा जा सकता है. किन्तु बाह्य परिस्थितियों और व्यक्ति की निष्क्रियता के कारण यह अंतर्चेतना सुषुप्त हो सकती है. ऐसा होने पर मनुष्य केवल चिकित्सीय दृष्टि से ही जीवित रह जाता है. इस कारण से जिज्ञासा प्रवृत्ति को सतत ऊर्जित और संवर्धित करने की आवश्यकता होती है जो मात्र मानसिक अभ्यास से संभव हो जाता है. इस विषय में कुछ मार्गदर्शिकाएं निम्नांकित हैं.
स्वयं को जानने हेतु प्रयासरत रहिये
लगता है कि प्रत्येक मनुष्य स्वयं को तो जानता ही होगा, किन्तु ऐसा नहीं है. स्वयं को जानना भी उतना ही कठिन है जितना दूसरों को. उदाहरणार्थ, आपने कोई सपना देखा, क्या आप जानते हैं कि आपने यह सपना क्यों देखा? निश्चित रूप से नहीं. यदि आप स्वयं को जानते तो इसे भी जानते. अतः स्वयं को जानने हेतु सदैव प्रयासरत रहिये, सदैव प्रश्न कीजिये कि आपके मन में अमुक विचार क्यों उठा, आपने अमुक सपना क्यों देखा, आपको अमुक भोजन क्यों पसंद है, आपकी दृष्टि में सौन्दर्य क्या है, आदि, आदि. आपको उत्तर न भी मिले तो भी प्रश्न तो कीजिये, एक न एक दिन आप उत्तर भी पायेंगे.
वस्तुतः हम स्वयं को भी इसी लिए नहीं जानते क्योंकि हमारे अन्दर स्वयं को जानने की उत्कंठा नहीं रही है. प्रयास करते रहिये, यही इसका मार्ग है. स्वयं के बारे में जिज्ञासा संवर्धित होगी तो जानेंगे भी.
सजग श्रोता बनिए
बहुधा देखा गया है कि वार्तालापों में कोई किसी को ध्यान से नहीं सुनता, सभी दूसरों को सुनाना चाहते हैं. जबकि प्रत्येक वार्तालाप की प्रमुख गतिविधि 'सुनना' होती है न कि ;सुनाना', सदैव ध्यान रखिये. इस गुण को संवर्धित करने के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है. इस विषय में यह भी सही है कि अनेक लोग अनर्गल वार्ता करते हैं जिनको सुनने से भी कोई लाभ नहीं होता और समय नष्ट होता है. जब आप सुनने को महत्व देंगे तो केवल सुनाने वालों की अनर्गल चर्चाओं से भी दूर रहने का प्रयास भी करेंगे. इससे आप स्वस्थ वार्ताकारों की संगति विकसित कर लेंगे. किन्तु इसके लिए सबसे पहले आपको धर्य्वान श्रोता बनने का अभ्यास करना होगा.
वस्तुतः, सुनकर ही ज्ञान का संवर्धन होता है और इसकी गहनता बढ़ती है, और इसी से हमारे अन्दर नयी जिज्ञासाएं उत्पन्न होती हैं जिनकी संतुष्टि के लिए हम अधिक सजग और जीवंत बनते हैं.
नित्य नए मित्र बनाइये और जानिये
विश्व का प्रत्येक व्यक्ति अनन्य है और यह अनन्यता ही जानने योग्य होती है. इसके लिए नए मित्र बनाते रहिये और उनकी विशिष्टता जानने के प्रयास करते रहिये. जिज्ञासु प्रकृति के सर्जन का यह एक सहज उपाय है. किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि पुराने मित्रों को भूलते रहें. वस्तुतः ऐसी उत्कंठा जागृत हो कि हम प्रत्येक मित्र के बारे में अधिकाधिक जानें, तथापि उनकी निजता को भंग कदापि भंग न करें. प्रत्येक व्यक्ति की निजता के अतिरिक्त भी जानने हेतु बहुत कुछ होता है और हम उसका नगण्य अंश ही जान पाते हैं.
नित्य नयी वस्तुओं को जानिये
बाह्य वस्तुओं में हम में से अधिकाँश की प्रियतम वस्तु भोजन होता है, इसके आयाम भी अनेक होते हैं, यथा - दृश्य, गंध, स्वाद, पोषक-प्रभाव, स्रोत, निर्माण प्रक्रिया, आदि, आदि. जिज्ञासु प्रवृत्ति विकसित करने का यह सरल और सहज उपाय है कि हम जहां जाएँ वहां के स्थानीय व्यंजनों का उपभोग करें और उनके बारे में अधिकाधिक जानने के प्रयास करें. स्वयं के स्वास्थ विकास हेतु भी यह उपयोगी सिद्ध होता है क्योंकि मनुष्य का स्वास्थ भोजन से सर्वाधिक प्रभावित होता है.
नयी वस्तुओं के उपभोग की प्रवृत्ति जागृत करने हेतु सूत्र यह है कि किसी भी वस्तु को स्वयं उपभोग किये बिना तुच्छ न समझें. साथ ही यह भी स्वीकार करें कि किसी वस्तु के बारे में हम जो भी जानते हैं वह कभी भी पर्याप्त नहीं होता. इसी से हम अधिकाधिक वस्तुओं के बारे में गहनता से जानने हेतु प्रयासरत रहेंगे.
नवीन विषयों पर चिंतन कीजिये
ज्ञान का क्षेत्र सदैव अपरिमित रहा है और रहेगा. इस सागर में जब भी गोटा लगायेंगे, नए मोती ही प्राप्त होते रहेंगे. लगता तो ऐसा है कि प्रत्येक व्यक्ति के कुछ ही विचारित विषय होते हैं और कुछ में ही उसकी रूचि होती है. किन्तु यथार्थ यह है कि जिस प्रकार ज्ञान का विस्तार अनंत है उसी प्रकार मनुष्य का मस्तिष्क भी अनंत-सम सामर्थ्य रखता है और अधिकाँश व्यक्ति इस सामर्थ्य का नगण्य अंश ही उपयोग करते हैं - लगभग ५ प्रतिशत. अतः प्रत्येक मनुष्य के बारे में कहा जा सकता है कि उसमें अनंत ज्ञान अर्जित करने की सामर्थ्य विद्यमान होती है. इस सामर्थ्य से नित नए विषयों का अध्ययन किया जा सकता है, ज्ञान का विस्तार किया जा सकता है.
ज्ञान की दृष्टि से व्यक्तियों को दो वृहत वर्गों में रखा जा सकता है - विशिष्ट विषय ज्ञानी, और विविध विषय ज्ञानी. दोनों वर्गों में अनंत संभावनाएं विद्यमान होती हैं - ज्ञान को गहनतर करते रहने की और ज्ञानं को नए आयाम देने की. साथ ही प्रत्येक वर्ग के ज्ञानी के लिए दूसरे वर्ग के द्वार भी सदैव खुले रहते है.
चिंतन में और इसके परिणाम प्राप्त होने में समय लगता है, इसलिए इस विषय में धैर्य की आवश्यकता होती है. चिंतन बलात की जाने वाली प्रक्रिया नहीं है, यह सहज भाव से संचालित होता है और इसके परिणाम सहज भाव से ही उगते हैं. आपको बस यह करना होता है कि आप चयनित विषय का अपने मस्तिष्क से परिचय करा दीजिये और शेष उसी पर छोड़ दीजिये. मस्तिष्क अपनी सुविधा और सामयिक उत्प्रेरण से दिए गए विषय पर स्वयं चिंतन करेगा और यथा शीघ्र आपको परिणाम उपलब्ध कराएगा.
उपरोक्त सभी अभ्यासों का मंतव्य व्यक्ति में जिज्ञासु प्रवृत्ति का विकास करना है और इसके उपरोक्त के अतिरिक्त भी अनेक मार्ग और आयाम हो सकते हैं. सूत्र रूप में यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि हमारे लिए मात्र जीवित रहना पर्याप्त न होकर जीवंत होना श्रेयस्कर है जिसके लिए हमें सतत जिज्ञासु बने रहना चाहिए.


उत्तम सलाह!
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