उक्त कारणों से इस प्रकार की व्याधियों के अध्ययन, शोधन और निराकरण के लिए इन्हें एक विशिष्ट नाम Neglected Tropical Diseases (NTD) अलक्षित शीतोष्णज व्याधियां (अशीव्या) दिया गया है. चूंकि उक्त क्षेत्रों का लगभग प्रत्येक निर्धन व्यक्ति इनसे पीड़ित है, जो उसे वर्षों, दशाब्दियों अथवा जीवन भर ग्रसती हैं. विश्व स्तर पर इनके विरुद्ध रण नीतियां तैयार की जा रहीं हैं और युद्ध आरम्भ किया जा चुका है. यहाँ इन्हीं व्याधियों और इनके निदान की चर्चा है. इनमें प्रमुख रूप से सात व्याधियां हैं जिनमें से चार भारत में घातक रूप में उपस्थित हैं. इन में से तीन उदर कीटाणुओं के कारण तथा एक देह-क्षार कीटाणु हैं.
उदर कीटाणु
ये पराश्रयी जीव रोगी की आँतों में निवास करते हैं तथा इनमें से तीन अत्यधिक घातक हैं. इनमें से सर्वाधिक पाया जाने वाला गोल कीटाणु (round worm) है जो विश्व के ८००,०००,००० लोगों को ग्रस रहा है. इससे एस्केरिअसिस (ascariasis) नामक रोग उत्पन्न होता है. दूसरे स्थान पर गुदा कीटाणु (whip worm) है जिससे त्राइकुरिअसिस (trichuriasis) नामक रोग उत्पन्न होता है और जो विश्व के ६००,०००,००० लोगों को ग्रस रहा है. ये कीटाणु बच्चों के पोषण का अपहरण करते हैं और उनके शारीरिक विकास में बाधा बनते हैं. इस वर्ग का तीसरा किन्तु सर्वाधिक घातक कीटाणु हुक-कीटाणु (hookworm) है जिससे ६००,०००,००० लोग पीड़ित हैं. ये लगभग एक सेन्टीमीटर लम्बे कीटाणु होते हैं जो रोगी की छोटी आंत के अन्दर चिपके होते हैं और जोंक की तरह उसके रक्त को चूंसते रहते हैं. इससे मनुष्य में गंभीर रक्ताभाव के साथ-साथ लौह और प्रोटीनों के अभाव उत्पन्न करते हैं. इससे बच्चों का रंग श्वेत हो जाता है और उन्हें अध्ययन करने में कठिनाई होती है. ४०,०००,००० से अधिक गर्भवती महिलायें भी इस कीटाणु से पीड़ित हैं जिससे उनमें मलेरिया होने की संभावना बढ़ती है और जन्म देते समय अतिरिक्त रक्त स्राव होता है. इनके गर्भों से उत्पन्न शिशु अल्प भार के होते हैं.
देह-क्षार (Lymph) कीटाणु
मनुष्य के शरीर में एक क्षारीय जल जैसे द्रव का सतत प्रवाह होता रहता है जो इस हेतु वाहिकाओं के माध्यम से होता है. इन वाहिकाओं में भी एक पराश्रयी कीटाणु वास करता है जो मनुष्य में लिम्फटिक फ़ाइलरिअसिस (lymphatic filariasis) नामक रोग उत्पन्न करता है. इस कीटाणु से एशिया, अफ्रीका और हैती के १२०,०००,००० लोग पीड़ित हैं जो उनकी वाहिकाओं के अतिरिक्त उनके स्तनों, योनियों आदि में भी पाया जाता है. इससे हाथीपांव रोग उत्पन्न होता है जिससे पुरुष श्रम के तथा स्त्रियाँ विवाह के अयोग्य हो जाती हैं.
इसके कारण शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों में रक्ताभाव, कुपोषण, अन्धता, मानसिक दरिद्रता, आदि रोग पनपते हैं जिनके कारण लोगों की मृत्यु तो नहीं होती किन्तु वे स्वस्थ नागरिक भी नहीं बन पाते. इनमें विकलांगता, शारीरिक विकृतियाँ, त्वचा रोग, तथा गर्भावस्था की विकृतियाँ विकसित हो जाती हैं. मृत्यु न होने के कारण इन क्षेत्रों में जनसँख्या की अधिकता भी एक बड़ी समस्या है जो पुनः उक्त रोगों का कारण बनती है. इससे इन क्षेत्रों में निर्धनता विकसित ही नहीं होती यह अपना वर्चस्व सतत बनाए भी रखती है. इससे बच्चों का स्वस्थ विकास नहीं हो पाता और वयस्कों की शारीरिक क्षमता भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती. इन रोगों का घातक पक्ष यह है कि इन के कीटाणुओं की संख्या तीव्रता के साथ बढ़ती है और एक रोगी के मल द्वारा अन्य लोगों में भी फ़ैल जाते हैं.
इन व्याधियों के निवारण के लिए ऐसी गोलियां विकसित की गयी हैं जिनकी एक खुराक ही पर्याप्त होती है और इनसे रोगी को कोई हानि भी नहीं होती. इस प्रकार की सस्ती एवं निरापद औषधियों की उपलब्धि पर भी अभी केवल १० प्रतिशत रोगी ही समुचित चिकित्सा पा रहे हैं, शेष अज्ञानता और निर्धनाता के कारण अभी भी इन रोगों से पीड़ित बने रहते हैं. इन औषधियों के उपयोग में यह भी महत्वपूर्ण है कि साथ-साथ रहने वाले सभी व्यक्तियों द्वारा इनका सेवन एक साथ किया जाना चाहिए ताकि किसी भी व्यक्ति में इन कीटाणुओं के उपस्थित रहने की संभावना न रहे. इस उपचार के साथ ही लोगों द्वारा मच्छरदानियों का उपयोग, बच्चों का टीकाकरण, और विटामिन ए द्वारा पोषण भी लाभकर सिद्ध होता है.
मूल रूप में ये व्याधियां स्वयं कारण न होकर अन्य कारणों के प्रभाव हैं, जिनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण अस्वच्छता है जो घरों में और बाहर फ़ैली रहती है. स्वच्छ पेय जल की उपलब्धि भी इन व्याधियों के निवारण में सहायक सिद्ध होती है.


लेखक के स्वास्थ चिंतन आधारित आलेख लोकोपयोगी होते हैं ।सतत लेखन प्रशसनीय है।
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