- अपने बारे में सकारात्मक भ्रम,
- भविष्य के बारे में आशावादी भ्रम, और
- व्यक्तिगत नियंत्रण के बारे में सकारात्मक भ्रम.
इस प्रकार के भ्रम जीवन के अनुकूल होते हैं क्योंकि ये मनोवैज्ञानिक स्वास्थ वर्धक ही नहीं होते, इनसे शारीरिक स्वास्थ को भी लाभ प्राप्त होता है.
मनुष्य का स्वास्थ वास्तविक परिस्थितियों के अतिरिक्त उसकी मानसिक स्थिति पर भी बहुत अधिक निर्भर करता है. मानसिक स्थितियों में 'चिंता' अथवा 'व्यग्रता' एक ऐसी स्थिति है जो व्यक्ति को वास्तविक परेशानी से कहीं अधिक कष्टदायक होती है और उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ को दुष्प्रभावित करती है. सकारात्मक भ्रम व्यक्ति को चिंतामुक्त बनाये रखते हैं, चाहे उस पर मुसीबतों का पहाड़ ही क्यों न टूट रहा हो. मुसीबतों में आशावादी दृष्टिकोण बनाये रखना उन्हें कम करने में भी सहायता करता है चाहे यह दृष्टिकोण कितना भी अव्यवहारिक क्यों न हो.
अवसाद मानव जाति के लिए एक घातक रोग सिद्ध हो रहा है, जो यथार्थ अथवा काल्पनिक चिंताओं से पनपता है. इस प्रकार सकारात्मक भ्रम व्यक्ति को चिंतामुक्त रखने के कारण अवसाद जैसे घातक रोग से बचाता है. मेरा सुविचारित मत है कि पूरी स्वस्थ व्यक्ति, कुछ सीमित मोटापा लिए, मानसिक उत्पीडन से मुक्त रहते हैं और जीवन की समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं होते. इसलिए उन्हें चिंताएं नहीं सताती और इससे वे और भी अधिक स्वस्थ रहते हैं.
रोग ग्रस्त होने की स्थिति में भी रोग के बारे में सकारात्मक भ्रम के कारण निश्चिन्त रहने से रोग की उग्रता तथा उसकी गति कम पायी जाती है, जो अनेक शोधों से सिद्ध हुआ है. इसी प्रकार के शोधों से पाया गया है कि सकारात्मक सोच और अच्छे स्वास्थ का गहन सम्बन्ध है. सकारात्मक भ्रम मनोवैज्ञानिक स्तर पर कार्य करते हैं और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ दोनों पर सीधा सकारात्मक प्रभाव छोड़ते हैं. तनाव की स्थिति में मनुष्य का मस्तिष्क कॉर्टिसोल नामक रसायन अधिक उत्पादित करता है, जो सकारात्मक भ्रम रखने वाले व्यक्तियों में कम उत्पादित होता पाया गया है.
सकारात्मक भ्रम के समर्थन के साथ यह चेतावनी भी प्रासंगिक है कि ऐसे भ्रमों का उपयोग केवल अवसाद की स्थिति से बचने के लिए किया जाना चाहिए न कि रोग की उपयुक्त चिकित्सा में लापरवाह बने रहने के लिए. रोगी व्यक्ति को रोग की घातकता की चिंता से तो मुक्त रहना चाहिए किन्तु उसे यह भी जानना चाहिए कि ऐसा तभी तक है जब तक कि वह रोग की उपयुक्त चिकित्सा करवाए.
ईश्वर के अस्तित्व में आस्था निश्चित रूप से एक भ्रम है, और विश्व की अधिकाँश जनसंख्या इससे ग्रसित है. तथापि इस जनसँख्या में से अधिकाँश व्यक्ति इस भ्रम का लाभ उठा रहे हैं, यह मान कर कि कोई महाशक्ति उनके हितों की रक्षा कर रही है जिससे वे आपदाओं में भी प्रसन्न बने रहते हैं. किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे इस अन्धविश्वास के कारण दूसरे स्वार्थी व्यक्तियों के आडम्बरों के शिकार बनते रहें अथवा इस बारे में आडम्बर रचाकर दूसरों को शिकार बनाते रहें.


विचारणीय व सार्थक प्रस्तुती ,कास सभी लोगों में यह भ्रम पैदा हो जाय की वह शहीद भगत सिंह और महात्मा गाँधी हो सकते हैं ..इसलिए इन भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाप आवाज उठानी चाहिए लेकिन आज उल्टा भ्रम हो गया है लोगों में की आवाज उठाते ही जान चली जाएगी ...भ्रम के वजह से अत्यधिक डरपोक हो गए हैं लोग ...?
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह बंसल जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंभ्रम और वह भी लाभदायक!
मनोमंथन कोई आपसे सीखे।
क्या बात है। भ्रम पर इतनी सटीक व्याख्या आसान शब्दों में। वैसे चित्र ही सब कुछ कह गया। हाहाहाहाहा
प्रत्युत्तर देंहटाएंजरा इसके साइड इफेक्ट भी लोगो को बता दें कि गलत भ्रम नहीं पालना चाहिए।.....
अच्छी प्रस्तुति