बहुधा कहा जाता है कि हमें प्राकृत जीवन जीना चाहिए क्योंकि प्रकृति जीवन के अनुकूल होती है. किन्तु उपरोक्त घटनाक्रम से स्पष्ट है कि बकरी को यदि प्रकृति के ऊपर छोड़ दिया जाता तो उसकी मृत्यु अवश्यम्भावी थी. जंगल में मुक्त रहने वाले अनेक जानवरों का ऐसी परिस्थितियों में मृत्यु ही होती है. प्रकृति में मृत्यु की प्रचुरता है, जिसकी खातिपूर्ति के लिए प्रकृति में जन्म दर भी बहुत अधिक होती है. इस प्रकार प्रकृति में जन्म और मृत्यु दोनों के बाहुल्य से संतुलन बना रहता है.
मानव सभ्यता विकास ने प्रकृति के जन्म-मृत्यु विधान से भिन्न व्यवस्था स्थापित की है, जिसमें जन्म और मृत्यु के मध्य स्वास्थ के लिए चिकित्सा की व्यवस्था है. तदनुसार प्रत्येंक जन्म लेने वाले व्यक्ति को मृत्यु से यथासंभव दूर रखा जाता है. इस व्यवस्था में प्रकृति की भीषणताओं - गर्मी, सर्दी, वर्षा, आदि. से मनुष्य जीवन की रक्षा के लिए भवन, वस्त्र, आदि विकसित किये गए हैं. इस व्यवस्था के कारण मानवों के स्वास्थ में सुधार हुआ है, जीवन अवधि में विचारणीय वृद्धि हुई है, और मृत्यु दर में कमी आयी है. अतः जन्म और मृत्यु का संतुलन बनाए रखने के लिए जन्म दर में कमी किया जाना अपरिहार्य हो गया है. भारत जैसे जो समाज इसका अनुपालन नहीं कर रहे हैं, वे भारी भूल कर रहे हैं.
प्राकृत जीवन का अर्थ जंगली जीवन है जैसा कि अनेक आदिवासी अभी भी जी रहे हैं. इसमें कष्ट और दुःख बहुत हैं. मनुष्य में बुद्धि है जिसके उपयोग से वह प्राकृत जीवन से बेहतर जीवन की व्यवस्था कर सकता है, और वस्तुतः यह व्यवस्था की भी गयी है. किन्तु इस व्यवस्था में अनेक भूलें हुई हैं जहाँ प्रकृति की समान्तर व्यवस्था पर अतिक्रमण किया गया है और मानवों को इसके दुष्परिणाम झेलने पड़ रहे हैं.
इस प्रकार मनुष्य जीवन व्यवस्था प्रकृति की जीवन व्यवस्था से भिन्न है, इसलिए मनुष्यों द्वारा प्राकृत जीवन जीने का परामर्श मिथ्या और अतार्किक है. मानव सभ्यता प्रकृति के समान्तर व्यवस्था है. जिस प्रकार मनुष्यों ने अपनी व्यवस्था में भवन, वस्त्र आदि विकसित कर प्रकृति के हस्तक्षेप को प्रतिबंधित किया है, उसी प्रकार मानुषों को भी प्रकृति की समान्तर व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. उदाहरण के लिए अति उच्च वातावरणीय तापमान से शरीर की रक्षा के लिए भवन, वस्त्र आदि का उपयोग तो किया जा सकता है, किन्तु वातावरण के तापमान में परिवर्तन के प्रयास करना प्रकृति की व्यवस्था में अवांछित हस्तक्षेप है, जिसके परिणाम प्रकृति और मनुष्य जाति दोनों की समान्तर व्यवस्थाओं के लिए घातक होंगे.

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